© Anupama 2021
As authentic and as vulnerable I can be in a semi-personal, public space. I am who I am.
कल रात एक पोस्ट पर एक कमेंट किया, लेकिन ये विचार अस्तित्त्व को सौंप कर सोई थी, कि जब सुबह उठूँ तो थोड़ा हिम्मत से, थोड़ा और साफगोई से, थोड़ा और मन खोल के कह और लिख पाऊँ |
उससे पहले कुछ चीज़ें | एक बड़ी उम्र तक (लगभग 4 साल पहले तक ) मैंने ये कहा है कि मुझे अपनी लड़ाइयों से फुर्सत नहीं है, इसलिए, मैं feminism ही नहीं किसी भी तरह की political debate से दूर रहना चाहती हूँ | दूसरी बात - मैं cishetro हूँ | और मैं यौन जागरूकता पर बहुत सालों से बात करती रही हूँ छुप छुप कर | सिर्फ पिछले एक साल में, कुछ दोस्तों के साथ, कुछ अजनबियों के साथ बात करते करते, अब जा कर अपने नाम से, इस ID से बात करने लगी हूँ | पिछले चार सालों में हम बहुत बदले हैं, हमने बहुत सी additional लड़ाइयाँ लड़ी हैं, हमें उन बातों को सरोकार बनाना पड़ा है, जिन बातों को हमने कभी सरोकार की तरह देखा ही नहीं | और मेरे लिए इसमें व्यक्तिगत तौर पर दो चीज़ें शामिल रहीं | एक स्त्रियों की ज़िन्दगी को नज़दीक से परखना | दूसरा intersectionality को समझना |
इसलिए मैं अब जो भी लिखने जा रही हूँ, वो सब मेरे अपने भोगे यथार्थ, या आस पास भोगे यथार्थ हैं | और ये संख्या शायद आपकी कल्पना से बड़ी हो | मुझे नहीं पता कि ये किसी तरह का विमर्श है या नहीं | व्यक्तिगत तौर पर मुझे फ़र्क भी नहीं पड़ता, लेकिन मुझे लगता है, कि ये बातें कही जानी ज़रूरी हैं | हो सकता है आप में से कुछ लोग मेरी बातों को इसलिए ख़ारिज करें कि मैंने स्त्रीवाद की लम्बी लड़ाई नहीं लड़ी | कि मेरी अपनी misogyny अभी गयी नहीं | कि मैंने स्त्रीवाद से पहले यौनिकता को समझा | लेकिन मेरा सिर्फ इतना कहना है - ये लोगों के जीवन के सत्य हैं | ये बहुत सी उन औरतों के जीवन के सत्य भी हैं, जो इस पोस्ट को पढ़ कर शायद ये कहें 'ये सिर्फ sensationalizing है' | ये मुझसे पिछली पीढ़ियों के भोगे हुए यथार्थ भी हैं, ये अगली पीढ़ियों में बिलकुल ख़त्म हो जायेंगे, ऐसी कोई उम्मीद नहीं है मुझे |
सो अब वो बातें किन्हें मैं असल में कहना चाहती थी
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कुछ देर के लिए स्त्री'वाद' को अलग रखते हैं, सिर्फ औरतों की बात करते हैं | मैं ३१ साल की थी, जब मैंने पहली बार ये जाना कि इस देश की करोड़ों औरतों को टॉयलेट नसीब होने पर कैसे जूझना होता है | जिन्हें खेत में जाने से पहले अनजान मर्दों की उपस्थिति से डरना होता है | जिन्हें या तो अलसुबह, या धाम ढले खेत नसीब होता है | बाकि समय मिला तो ठीक नहीं तो जो है सो है | "अठै तो यान ही चालै बाई राज' पचासों बार गाँवों में बचपन में सुना है मैंने | बचपन से ब्लैडर होल्ड करने की, घर से टॉयलेट जा के निकलने की सीख मुझे मिली | भाइयों को भी मिली, लेकिन कारण अलग थे | उन्हें तहज़ीब के कारण सिखाया जाता था , मुझे इसलिए कि लड़की को सड़क पे टॉयलेट करने कहाँ मिलेगा | लेकिन 2015, देर रात, मैं एक पार्टी से लौटी, ब्लैडर फुल, होटल का लू इतना गन्दा कि इस्तेमाल का मन नहीं | सड़क पे मेरा दोस्त गाड़ी रोकने में खुश नहीं, और घर डेढ़ घंटा दूर | उस रात ने Feminism की लड़ाई के लिए मुझे पहली बार अवेयर किया |
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मैं 18 साल की थी, जब मेरी एक सहेली भाग ने भाग के शादी कर ली | मैंने बचपन से अपनी दादी से बहुत लड़ाई कि थी, कि कहीं गलती से मेरी शादी मेरी इच्छा के खिलाफ, बचपन में करने की सोचना भी मत, वर्ना मैं घर छोड़ के भाग जाऊंगी | दूसरी ओर मुझसे बेहतर, मुझसे ज़्यादा अच्छे घर से आने वाली ये सहेली?? उसी साल पापा के एक बहुत नज़दीकी दोस्त के बेटे ने प्रेम विवाह किया | सबने ख़ुशी ख़ुशी भैया की शादी रचाई | मैंने फिर पापा से पूछ ही लिया, कभी मैंने प्रेम विवाह रचा लिया तो? कभी मैं भाग गयी तो? पापा ने बहुत ही आराम से, बिना रिएक्ट किये सिर्फ एक ही बात कही - 'उसकी क्या ज़रुरत है ? घर लाना, मिलवाना, अच्छा होगा तो हम शादी कर देंगे, कुछ गलत लगेगा तो बता देंगे | हमारी रज़ामंदी न हो, और तुम्हें फिर भी करनी हो, ज़िद ठान लो तो तुम्हारी ज़िन्दगी की असली ज़िम्मेदार तो तुम ही हो " | और भी बहुत बातें, लेकिन ये चंद वाक्य मेरे साथ रहे |
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22 साल की उम्र में मैं घर वालों को 'convince' करके पढ़ने दिल्ली आयी | यहाँ लोकल गार्डियन थे | उन्हें अजीब लगता कि छोटे शहर की छोटी सी लड़की अपने आप हॉस्टल ढूंढ रही है, क्लास के लड़कों से बात कर रही है, उनके साथ बेंच पे बैठ के समोसे खा रही, और फिजिक्स के न्यूमेरिकल्स कर रही है ? और उनके बचपन के दोस्त जो मुझसे २० साल बड़े हैं, मेंटरशिप और फ्रेंडशिप के नाम पर मेरी maturity में एजुकेशन करना चाह रहे थे | कहानियाँ तो खूब बनाईं सुनाई गयीं हमारी माँ को, जब हमने आँख दिखा दी पहली ही बार | लेकिन उनकी दोस्ती उन्हें मुबारक, मेरी माँ का हीरा मैं थी | मम्मी आयी, हॉस्टल चेंज करवाया, एक और मामा जिनके बच्चे हमारी उम्र के थे, उन्हें कहा गया मेरा ध्यान रखने को |
मैंने माँ को कहा मुझे वापस ले चलो | उन्होंने कहा 'आज नहीं, घर वापस तभी आना जब scheduled है | आज अगर लौटा के ले गयी, तो कभी बहार पेअर नहीं रख पाओगी | मुझे भरोसा भी है, और अगर कुछ हो जाये तो डरना मत, सब संभाल लेंगे | "
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इस दौरान मैं 4 साल से depression से आलरेडी जूझ रही थी, लेकिन मैं उसकी डिटेल्स में अभी नहीं जाऊँगी | दिल्ली मेरे लिए कमोबेश शॉक ही था | लेकिन माँ ने जब मेरे दूसरे मामा को कह के मुझे उनके घर भेजा तो कहा, "उसकी तबीयत ठीक नहीं है " | मामा ने पूछा तबीयत को क्या हुआ, मैंने कहा कुछ नहीं | मामा और माँ ने फिर बात की, मामा ने माँ से पूछा क्या हुआ, और माँ ने कुछ बताया | मामा मुस्कुरा दिए धीरे से, बोले,ओह कोई बात नहीं, ये सब होता है, सब ठीक हो जायेगा |
मेरे साथ जो रहा वो था ये | मुझे ये यकीन ही नहीं, था, कि इस देश में मिडिल क्लास 'की लड़की' को मानसिक स्वास्थ्य सम्बन्धी किसी समस्या से गुजरने का हक़ भी है | घर वालों ने कभी कुछ नहीं कहा, लेकिन आसपास जो दो चार केस देखे थे, उन्हें देख के मुझे हमेशा एक ही बात लगी - मुझे ऐसा नहीं बनना |
मेरी सहेलियों की एक एक कर शादी होने लगी थी | मुझे हैरत होती थी कितनी आसानी से इन लड़कियों ने सब पढ़ा लिखा ताक पे धर दिया था |
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अब आते हैं मुद्दे की बात पर | Cis hetero हूँ | और जवानी की उम्र में, सबको अपने पसंदीदा जेंडर के लोगों के लिए आकर्षण होता है | लेकिन अच्छी लड़कियां sex नहीं करती | अच्छी लड़कियाँ सेक्स की बात भी नहीं करतीं | लड़के लेकिन करते हैं ! और ये सच है, कि सेक्स का कन्वर्सेशन उत्तेजना, उत्सुकता तो जगाता ही है | ये नैसर्गिक है, स्वाभाविक भी है | बस एक बात ध्यान रखें, कि भाषाई तथा शारीरिक तौर पर लैंगिक हिंसा इसका एक बहुत बड़ा हिस्सा है |
अगर सेक्स और उसके बारे में संवाद ज़रूरी नहीं, तो बच्चियों को रेप के बारे में कैसे समझायेंगे? उन्हें कैसे सम्बल देंगे इस बात का कि किसी लड़के को पसंद करना गलत नहीं है, गुनाह नहीं है ? कि किस करने से प्रेग्नेंट नहीं होते | कि प्रेग्नेंट होना कोई एक्सीडेंट नहीं होना चाहिए, वो planned इवेंट होना चाहिए | कि प्रेगनेंसी के अलावा भी चीज़ें हैं जिन्हें समझना ज़रूरी है | कि जैसे आपका सामान्य स्वास्थ्य आपकी ज़िम्मेदारी है, वैसे ही आपका यौन स्वास्थ्य भी | इसलिए सेक्स के बारे में खुल के बात करना ज़रूरी है ये समझने में बहुत वक़्त लगा |
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मेरे लिए यौन विमर्श का हिस्सा सिर्फ reproduction नहीं रहा | लेकिन बहुत सी महिलाओं की लड़ाई अभी भी वहां अटकी है, ये भी समझती हूँ | सेक्स, सेक्सुअल ऑर्गन्स, सेक्सुअल हेल्थ, जेंडर, सेक्सुअलिटी, इन सब बातों के बारे में न कोई बात करता है, न करना चाहता है | अधिकतर इन मुद्दों को अगर समझाया भी जाये तो वो ऊपर ऊपर सतही तरीके से कह दिया जाता है | जब हम लोग छोटे थे, तो माँ लोग कहतीं 'कौआ काट गया है, इसलिए किचन में नहीं जाएँगे " |
अब हम बच्चे जल्लाद - कहाँ है कौआ, कब आया, हमें क्यों नहीं दिखाया, कहाँ काटा , कैसे काटा , भगाया क्यों नहीं, इंजेक्शन लगवाने चलो, आदि आदि | शुरू शुरु में नाक में दम कर दिए थे | फिर एक दिन हमारी भी बारी आयी | गर्ल्स स्कूल, टॉयलेट में स्टेंस देखे, बड़ी दीदियों से पूछा - जवाब मिला जो कंस्ट्रक्शन साइट की मजदूर औरतें हैं, उनको कैंसर हो जाता है | पहुंचे माता के पास - बोले मजदूर औरतों के लिए कुछ करना है हमको |
पहली बार पीरियड क्या होता है, समझाया गया | जब हमारी बारी लगी तो हमको पता था | हमारे लिए सेनेटरी नैपकिन २० साल की उम्र तक माँ ही लाती रहीं | पहली बार सेनेटरी नैपकिन २० साल की उम्र में खरीदा, इमरजेंसी में | जनरल स्टोर से | दुकानदार नज़र चुरा के दिया | अख़बार में लपेट के काली प्लास्टिक की पन्नी में बाँध के मेडिकल स्टोर वाला देता | हम सोचते लोग बेवकूफ हैं क्या, उन्हें नहीं मालूम ऐसे क्या दिया जाता है? भक! सामने सामने लेकिन सीक्रेट | अब तो सब मिलता है | दिल्ली वगैरह में बिना पन्नी के भी मिल जाता है |
कल्पना कीजिये कितनी बॉडी शेमिंग कूट कूट के भर दी जाती है | किचन में नहीं जाना इसलिए, सारे घर वालों को पता है कि पीरियड हुआ है | दूध नहीं लेना और माँ घर नहीं है - इसलिए दूध वाले भैया, पड़ोस वाली चाची को भी पता है पीरियड हुआ है | लेकिन किसी को बताना मत, दाग न लग जाये, blah blah. अब हंसी आती है, तब कट के रह जाते थे भीतर ही भीतर |
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मैंने पहली बार पोर्न २३ साल की उम्र में देखा | जाने कैसा तो जी हो आया | आज भी अच्छी सुरुचिपूर्ण erotica बहुत चाव से पढ़ सकती हूँ, लेकिन पोर्न बर्दाश्त नहीं कर पाती | क्योंकि पोर्न और इरोटिका दोनों में औरत अधिकतर भोग्या है, लेकिन visual frames गले नहीं उतरते | मुझे 6 साल लगे ये डी-कोड करने में कि असली ज़िन्दगी और पोर्न में ज़मीन आसमान का अंतर है | लेकिन मुझे 6 साल लगे, क्योंकि मुझे 6 साल तक कोई ऐसा इंसान नहीं मिला, जिससे मैं खुल के बात ही कर पाती इस बारे में | और ये तब, जब कि मैं यौन विमर्श वाली कुछ communities का हिस्सा थी पहले से |
अब अगर ये कहूँ कि ये सब बातें मेरे स्त्रीवाद का हिस्सा नहीं हैं तो ये झूठ होगा | मुझे शिक्षा आसानी से मिली, इसलिए मेरी लड़ाई, थोड़ी आगे बढ़ पायी | मुझे मानसिक स्वास्थ्य सम्बन्धी सम्बल घर में मिल पाए, इसलिए मैं उसके आगे बढ़ पायी | मुझे सुलझे लोग मिले बात करने के लिए, इसलिए मेरी व्यक्तिगत स्वतंत्रता की लड़ाई थोड़ी आगे खड़े हो शायद | लेकिन सब कुछ सुन्दर नहीं था |
Communities में वो लोग भी थे, जो आज़ादी का जामा पहन के, यौन शोषण करना चाहते थे | लेकिन वैसे लोग तो दफ्तरों में भी मिले, वैसे लोग तो घरों में भी दिखे, वैसे लोग तो दोस्तों में भी मिले | तो क्या दुनिया पे भरोसा करना छोड़ दूँ? या क्या अपना सच कहना छोड़ दूँ?
मुझे यौनिकता के बारे में सलीके से बात करना गैर-मुल्क के लोगों ने सिखाया | उन्होंने घंटों मुझसे चैट्स की, मेरे सवालों के जवाब दिए | ये जानते हुए कि उनकी आधी बातों को मैं ये कह के खारिज करती थी "इन्हें मेरे culture और मेरे सामाजिक परिवेश की समझ नहीं है |" और ये सारी चीज़ें, मैं आज तक इस्तेमाल करती हूँ | मैं कभी विदेश नहीं गयी, लेकिन इन चीज़ों ने मदद तो मेरी यहाँ भी की | Safe रहने में, सही resources access करने में, लोगों को बेहतर समझ पाने में, अपने से छोटी लड़कियों को मज़बूत बना पाने में |
आज दसियों साल बाद, जब उनमें से कई लोग गुज़र गए हैं, कइयों के बारे में मुझे अब कुछ नहीं पता; मैं शुक्रगुज़ार हूँ उन औरतों और आदमियों की, जिन्होंने मुझे ये समझाया, कि मेरी यौनिकता मेरे जीवन का भी एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है, और मेरे स्त्रीवाद का भी |
मेरे लिए यौन विमर्श स्त्री विमर्श का हिस्सा है क्योंकि:
1. वो मुझे हिम्मत देता है कि मैं अपनी माँ से कह सकूँ कि आप मेरे लिए लड़का ढूंढें, लेकिन वो जो मुझे हर स्तर पर बराबर समझे, जो मुझे भोग्या नहीं, साथी समझे | जो STD रिपोर्ट और करैक्टर सर्टिफिकेट में फ़र्क़ समझता हो |
2. मेरा यौन विमर्श मुझे हिम्मत देता है, कि कोई पुरुष जब लीचड़ चुटकुला सुनाये तो मैं उसे ठीक से समझा सकूँ कि internalized misogyny कैसी दिखती है |
3. यौन विमर्श मुझे marital रेप को मैरिटल रेप कहने की समझ और हिम्मत देता है |
4. यौन विमर्श ने मुझे consent की परतें सिखायीं | सिखाया कि alcohol के लिए न बोलना, और सेक्स के लिए न बोलना, दोनों एक बराबर हैं | और दोनों का सम्मान होना चाहिए |
5. यौन विमर्श ने मुझे न कहने के creative, सलीकेदार, non -negotiable तरीके सिखाये |
और भी बहुत कुछ
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ये सच है कि मुझसे पहले बहुत औरतों ने सतीप्रथा के खिलाफ लड़ाई लड़ी, गोली बन कर राजस्थान के राज घरानों में दम तोड़ा, बहुत सी पढ़ने के लिए लड़ती रहीं, बहुत सी जाति से जूझती रहीं, बहुत सी workplace harassment से लड़ती रहीं | बहुत सी को दो वक़्त खाना नसीब नहीं, medical care नसीब नहीं | जिन्हें मयस्सर है, उन्हें इस्तेमाल करने में guilt फील होता है |
ये सब मेरी व्यक्तिगत समस्याएं नहीं हैं | लेकिन इसका मतलब ये नहीं, कि ये महत्त्वपूर्ण नहीं हैं | पर मैंने ये सब तब पहचानीं, जब मुझे अपनी यौनिकता को समझने की कोशिश करते करते 15 साल गुज़र गए | औजब मुझे morality की परतों को एक एक कर धकेलते हुए, अपने अस्तित्त्व को स्पेस देने की कोशिश करते हुए इतने साल गुज़र गए हैं |
हम औरतों को सिमट कर रहने की conditioning है, ऐसा मुझे लगता है | और ये इतनी internalized है कि हम priorities के पीछे spectrum की width को छुपाते हैं | हम लड़ते हैं, खुद के लिए, एक दूसरे के लिए भी, लेकिन एक सीमा के बाद रुक जाते हैं | इस में गलत कुछ नहीं | इसमें थकन भी होती है, ये भी सच है, लेकिन यही वो वक़्त भी है, जब आप खुद से, और दूसरी औरतों से कहें, "सुनो, तुम जो कर रही हो, उसमें मैं तुम्हारा साथ न भी दे पाऊं, तो भी मैं चाहती हूँ कि तुम भी जीतो ! " यही वो वक़्त है, जहाँ आप किसी को दूसरी औरतों के संघर्ष को जब छोटा करते देखें, तो कहें " तुम्हें ये समझना ज़रूरी है, कि अभी सफर बाकी है, अभी सबको बहुत सीखना है | दूसरों को सिखाओ, लेकिन तुम भी सीखो " यही वो समय है, जहाँ आप लड़कियों के साफ़ टॉयलेट, सेनेटरी नैपकिन को ज़रूरी समझें, लेकिन ब्रा स्ट्रैप और 'माय बॉडी माय राइट्स' के लिए लड़ने वाली लड़कियों और औरतों को नीचे न दिखाएं |
ये लड़ाई नहीं है, ये काम है | जो हमें अपनी औरतों, लड़कियों, और बच्चियों के लिए ही नहीं, पुरुषों, लड़कों, और बच्चों के लिए भी करना है | रास्ता कुछ भी हो सकता है | किसी का रास्ता शिक्षा से हो के गुज़र सकता है, किसी का लॉ से, और किसी का सेक्सुअलिटी से |
और भी बहुत कुछ है कहने के लिए, लेकिन वक़्त लगेगा |
© Anupama Garg 2021
It is not about who she is with. It is about who she is, when she is with you. Does it mean that you be deceived by appearances? No, it means that you see if she is honest, intense, compassionate, communicative with you. If she is, chances are that she is like this with everyone. Now, THAT is a good thing. That is actually a GREAT thing.
The question is are you able to accept her for this? Are you able to share her with her past lovers? With the ones who will come in future? Will you be able to accept that you may need to call her ex husband up when she is sick? Because he is still her emergency contact?
Will he be able to understand that she may have moved on, but that she still holds him dear. Even when they may be not co-parenting?
You see? Petty men and women all around the world, try to control, try to own, try to possess. When you are being petty, you dampen her spirit, to the detriment of her shining core. And then you hope for her to stay back. Oh your audacity!
Then there are the other kind of people. People who empower. People who encourage, people who enable, people who burn so bright that their light enables others to shine. Women and men who have goosebumps when they talk, a frisson down their spine when they sing, tears brimming of joy as much as of sorrow. People who are alive, people who are on fire!
More often than not, you will be the best lover you shall find. You will be the one who will accept that your Ex is still an emergency contact and that you are his. You will be the one aware that it is OK to step back, let friends and family shine. It is OK to let go. It is OK to be single and love, instead of crying to be loved.
It is said, that when Baba Fareed used to bless someone, he's say - " जा तुझे इश्क हो (may you be in love)"
वो जो तुम्हारे खोटे सिक्के हैं
वो जो हर बात पे खिखिया देते हैं
वो जो हर बात को हलके में उड़ाते हैं
उनसे कभी कह के देखो
प्यार है तुमसे
वो तुम्हें ऐसे समेटेंगे,
जैसे भर जनवरी की ठण्ड में,
दिन भर की धूप में सिका हुआ लिहाफ
वो जो तुम्हारे खोटे सिक्के हैं
जो हर बात पे चिल्ला देते हैं
हर बात पे लड़ लेते हैं
जो तुम्हारी whataboutery पे तुमको सुना देते हैं
उनसे एक बार
दिल से कह के देखो
तुम जैसे हो स्वीकार हो
वो तुम्हें ऐसे ढाँप लेंगे
साफ सुथरे, परे रहोगे तुम दुनिया भर की गंद से
वो सोंख लेंगे तुम्हारे सारे आँसू
बन जायेंगे तुम्हारे सारे तकियों का गिलाफ
सुना है ख़ास रंग तीन ही होते हैं
सुना है, हर रंग के अनेकों शेड्स होते हैं |
हरे के शेड्स, एक कौम के लिए,
लाल के, किसी राजनैतिक विचारधारा के लिए,
नीला लड़कों का, गुलाबी लड़कियों का,
और इंद्रधनुषी? क्युईर लोगों का कहते सुना है मैंने |
खेतों खलिहानों में सुना है,
हरे से सुनहला होता है रंग फसल का |
लेकिन भूख का रंग कौनसा है?
और प्यास का?
तिरंगे में तीन रंग हैं,
वीरता, अमन, और खुशहाली के|
मगर रंग कौन सा है,
कहो तो ज़ारो-ज़ार छलकते आँसुओं का?
वर्दियों के भी रंग सुने हैं
खाकी, सुफैद, काला |
मगर कहो तो तुम,
कौन सा है रंग,
शर्मसार करने वाले फैसलों का?
रंग हैं इतना भर काफी नहीं है,
रंगों को भरना होगा ,
सही रंग सही जगह |
तभी होगा सृजन सुंदरता का,
प्रकृति के गर्भ से,
मानव के मर्म से |
बाकी क्या है, रंग तो रंग हैं
सब मिल गए तो प्रकाश होगा,
वरना तो कालिख पुती ही है |
मुंह पर,
देह पर,
आत्मा पर भी!
© Anupama Garg 2021
Life has only logical response – Gratitude. We are entitled to nothing,
and no one owes us anything. In fact, gratitude is also the only
self-help tool that works. It empowers us, makes us humble, makes us
grateful, and allows us to trust others again.
Gratitude is a
practice that one needs to build and deepen over time. So, here is my
new year gift to you, the latest book on gratitude. The book works if
you work the book. So go on, click on the image, use the workbook, share it, forward it, pass it on,
and the book will have fulfilled its purpose.
Much love and gratitude!
बात बचपन की है | छोटी थी मैं, मुझे घर का सबसे खुरदुरा कम्बल अच्छा लगता
था | मम्मी पापा मुझे नाज़ुक चीज़ें ओढ़ाना चाहते और मुझे पता नहीं उस
नीले-मैरून कम्बल के फुंदों को गिन गिन के क्या सुकून मिलता | ५ -६ साल की
ही रही हूँगी मैं, लेकिन सोने की चोर तब भी थी | करवट ले के माँ से चेहरा
दूर कर, कम्बल के जितने फुन्दे मेरे हिस्से आते, उन्हें बार बार गिनती |
एक
डॉक्टर, एक गुड़िया, और एक मैं – उस गुड़िया की माँ, इन तीनों की कहानी
बार बार मैं अपने दिमाग में रचती | रोज़ नयी बातें, रोज़ नया किस्सा,
किरदार मगर बस ये ही तीन | उस उम्र तक गीताप्रेस की बाल भागवत पढ़ चुकी थी |
किसी ने पूछा बड़ी हो के क्या बनोगी तो कह दिया मीरा बाई | कुछ लोग चुप
रहे, कुछ ने वैसे ही समझा जैसे सब समझते हैं – लड़की को ये सब मत पढ़ाओ!
खैर पढ़ाया तो पापा मम्मी ने वो ही जो पढ़ाना था, और पढ़ा हमने भी वो ही जो हमें पढ़ना था
और हम बाल भागवत से हो कर, रामचरितमानस, भगवद गीता, श्रीमद्भागवत, से चलते
हुए, मंटो, खुशवंत सिंह, टॉलस्टॉय, आशापूर्णा देवी, तिलक, गांधी, गोखले,
सब तक हो कर वापस आ गए | अब सब रगों में दौड़ता है, चेतन मस्तिष्क को शायद
याद भी नहीं है | लेकिन ये बहुत अच्छे से याद है, कि मुझे तब भी ऐसे ही
घुटन होती थी | लगता था किसी ने बाँध दिया है | दुनिया भर की आज़ादी के
बावजूद, मुझे सुकून अपनी काल्पनिक दुनिया में ही मिलता था |
मीरा मेरे लोक मानस की माँ हैं | लेकिन वो सारी
औरतें जो करमा जैसी हैं, आग सुलगातीं , घर के काम करतीं, खीचड़ा पका के
डंडे के ज़ोर से धमका के, बचपन में ही कृष्ण को पुकारतीं हैं – उन सब माँओं
को कैसे भूल जाऊँ ? एक राजरानी, और एक का काम खेती-किसानी | आज इस उम्र
में कोई जब पूछता है क्या बनना है – तो लगता है मीरा बनना भी उतना ही दुरूह
है, जितना करमा बनना | सुगम बस एक ही चीज़ है, प्रेम ! और बस इसीलिए, मैं
मौन रह जाती हूँ, बस मुस्कुरा देती हूँ |
© Anupama Garg 2021
प्रेम कैसा है ? ८ अरब मनुष्यों और करोड़ों जीवों को सहेजती धरती जैसा |
कहिये कि वो तो प्यार नहीं कर्तव्व्य है ? कहिये कि वो प्रेम नहीं स्वभाव
है ? कितनी आसानी से हम मनुष्य आकाश को हल्के में लेते हैं | कितनी आसानी
से हम ये मान लेते हैं, कि हम सूर्य की ऊर्जा का इस्तेमाल कर सकते हैं |
कभी कभी मुझे लगता है, विज्ञान और दर्शन प्रेम करना सिखाते हैं | बिज़नेस
बस बहुत दूर हो गया इन दोनों से, वर्ना समस्या तो वहां भी शायद इतनी न होती
|
क्यों मनुष्य ने खुदाई की होगी? इतना प्यार रहा होगा धरती से,
कि मन किया होगा इसे और जानूँ | और फिर चमकते टुकड़े मिले, और प्रेम का
स्वरुप बदल गया होगा | क्यों मनुष्य ने किसानी की होगी? नवांकुर फूटने पर
होने वाला आह्लाद कैसा रहा होगा, विस्मयकारक? फिर पेट में भोजन गया, और
संतुष्टि ने विस्मय की जगह ले ली होगी प्रायोरिटी लिस्ट में |
प्रेम
की अपनी यात्रा में, मैं अभी बाँटना सीख रही हूँ, सहना सीख रही हूँ| जितना
सीख चुकी हूँ, उससे कहीं ज़्यादा बाकी है | प्रेम की यात्रा में, मैं अपनी
अपेक्षाओं का बोझा न ओढ़ना चाहती हूँ, न लादना | मुझे भारी लगता है | ऐसे
बहुत लोग हैं, जिनकी साफ़ कह कर मांग पाने की क्षमता मुझे चमत्कृत करती है |
उनका सम्मान भी है | लेकिन मैं प्रेम अपने तरीके से टटोल के देखना चाहती
हूँ | मैं सहनशीलता, ठहराव, और बांटने की क्षमता के प्रति आग्रही हूँ |
लोग
हैं, जिनसे प्रेम है, और जब वे किसी और पर ध्यान देते हैं, तो अखरता है |
लेकिन ये जानती हूँ, कि वे लोग हैं, क्योंकि उनके माँ -पिता ने अपने प्रेम
की धरोहर इस देश-दुनिया को सौंप दी | ये भी कि वे लोग हैं, क्योंकि
उन्होंने अपना प्रेम दोस्तों, परिवार, रिश्ते-नातेदार, बृहत्तर समाज को दे
दिया | मगर सबसे ज़्यादा जो महसूसती हूँ, वो है ये बात कि मैं निर्बाध बहना
चाहती हूँ, और इसलिए ये आवश्यक है कि अपने जीवन के हर प्रेम के स्त्रोत को
भी निर्बाध बहने दूँ |
और निर्बाध बहने देने का, निर्बाध समेट
लेने का, निर्बाध समेट लिए जाने का, धरती से बड़ा उदाहरण क्या ही होगा ?
जिस क्षण में ये सोचती हूँ, उस क्षण में मेरे सामने जो बात एकदम निर्मल जल
के जैसी साफ़ चमकती है, वो है प्रेम का स्वरुप | मेरे लिए प्रेम कैसा है ? ८
अरब मनुष्यों और करोड़ों जीवों को सहेजती धरती जैसा |
© Anupama Garg 2021
This was written in repose to a facebook discussion, where we were discussing how doctors and patients relate with each other.
What do I mean by Compatibility?
मुझे नींद नहीं आती
शुक्राना है, कि मैं माँ नहीं, मैं पिता नहीं
शुक्राना कि Margaret Atwood के Handmaid's tale में
शायद मैं unwoman होती |
नहीं चाहिए मुझे वो बच्चियाँ जो सामान भर हैं,
सदियों से, दान के लिए, भोग के लिए, अत्याचार के लिए भी |
मुझे नींद नहीं आती
कि नहीं चाहिए मुझे भगोड़ापन,
शुतुरमुर्ग की तरह जो रेत में सर घुसा कर
बलात्कार पर तटस्थ रहता है |
जो कहता है, "हमारे यहाँ नहीं होता'
जो कहता है, 'ये दु:खद तो है, लेकिन ज़िम्मेदारी मेरी व्यक्तिगत नहीं |"
मुझे नींद नहीं आती
क्योंकि आज कोई 72 साल का बूढा आदमी आज सड़क पर नहीं निकलता |
जवान औरतें कैद हैं,
सोनचिरैया सी, या जंगली बटेर सी,
अपने अपने पिजड़ों में |
और जवान मर्दों को या धर्म की अफ़ीम चटा दी गयी है
या रोटी कपडा मकान में उलझा दिया है,
शक्ति या है नहीं
या उसका दुरुपयोग हो रहा है |
मुझे नींद नहीं आती
कि सारा देश गांधारी है,
कि सारा देश धृतराष्ट्र है |
क्या फायदा कृष्ण का देश होने का,
जब बनना हम सबको कौरव है?
मुझे नींद नहीं आती
डॉक्टर कहता है अवसाद है,
मुझे लगता है
ये मेरे द्रौपदी के देश में औरत बन कर पैदा होने का प्रतिसाद है |
"खलक खुदा का, मुलुक बाश्शा का
हुकुम शहर कोतवाल का.
हर खासो-आम को आगह किया जाता है
कि खबरदार रहें
और अपने-अपने किवाड़ों को अन्दर से
कुंडी चढाकर बन्द कर लें
गिरा लें खिड़कियों के परदे
और बच्चों को बाहर सड़क पर न भेजें
क्योंकि
एक बहत्तर बरस का बूढ़ा आदमी अपनी काँपती कमजोर आवाज में
सड़कों पर सच बोलता हुआ निकल पड़ा है !"
लेकिन नहीं, अब नहीं,
चलो हम सब बैठें घर में
नकार दें सत्य जातिगत हिंसा का,
स्त्री-द्वेष का
सड़क पर निकल कर क्या करेंगे?
Covid -19 से बचना ज़्यादा ज़रूरी है,
संप्रदाय विशेष, जाति विशेष, लिंग विशेष, यौनिकता विशेष, वर्ग विशेष को मरने दो |
नींद की गोली खाओ
सो जाओ |
मुझसे मत पूछो कि मुझे नींद क्यों नहीं आती,
कि मैं अभिशप्त हूँ
बैताल को कंधे पर ढ़ोते रहने को |
मुझे नींद नहीं आती,
मेरे भीतर का बैताल मुझे सोने नहीं देगा,
कि जब तक न्याय नहीं होगा |
© Anupama Garg 2020
* An excerpt from a poem by Dharmvir Bharti has been used.
"कितनी गिरहें खोली हैं मैंने, कितनी गिरहें अब बाकी हैं..."
चित्रा सिंह की आवाज़, गुलज़ार के बोल, और मेरे गंजे सिर को बेखयाली में सहलाता मेरा हाथ | मैंने धीमे से मुस्कुरा कर शीशे में झाँका | एक जोड़ी आँखें पलट कर मुस्कुराईं और कहने लगीं, "याद है, तुमने एक बार कुमार मुकुल का एक फेसबुक कमेंट पढ़ा था- सुनयना चूड़ियाँ पहनती है और मैं सोच! जब तुमने ये पढ़ा तो पलट के क्या लिखा था?"
मुझे याद आया मैंने क्या लिखा था |
मुकुल ने किसी को क्वोट किया ,
‘सुनयना चूडियाँ पहनती है,
और मैं सोच।’’
मगर,
क्या चूड़ियाँ और सोच,
नैसर्गिक रूप से, निश्चित ही,
एक दूसरे के विपरीत बोध है ?
क्या ही ज़रूरी है,
कि मैं जो सोच पहनूँ,
तो चूडियाँ छोड़ ही दूँ ?
मेरे घर में,
चूड़ियाँ और सोच,
साथ पहनी जा सकती हैं,
साथ पहनी जाती हैं
इसीलिए मैं,
चूड़ियाँ पहनती हूँ,
और साथ ही ...............सोच भी।
मगर जब मैंने ये लिखा था तो ३० पार किया ही था मैंने | कर्ज़ चुकता नहीं हुए थे | बेहतर नौकरी, बाहर पढ़ पाने की उम्मीदें, लम्बा वक़्त घर बिता पाने की आशाएँ, और उम्रदराज़ माँ - बाप की सेहत, और ज़िन्दगी की मुट्ठी से फिसलता वक़्त दिमाग पर हावी नहीं था | दिमाग आज़ादख्याल तो तब भी था, लेकिन आत्मा की स्वतंत्रता ने मेरे साथ बाहर- भीतर से लपक कर मन की बेड़ियाँ तोड़ने की साज़िशें नहीं रचाईं थीं |
प्रेम और साथ के बीच का फर्क, ईमानदारी, वफ़ादारी, झूठ, परिवार, शादी, करियर, आत्मपीड़न, आत्मवंचना, आत्महनन और ऐसे पचास हज़ार विचारों से भी वाक़फ़ियत नहीं थी तब | अब लगता है, उस सब की ज़रुरत ही नहीं होती, यदि सिर्फ तीन शब्द समझ आते हों. जीने आते हों - ईमानदारी, स्वतंत्रता, और करुणा | ऐसा नहीं कि फिर दुःख समाप्त हो जाता है, या कि उदासी सताती नहीं | ऐसा नहीं कि मौन से वैचारिक मुखरता समाप्त हो जाती है | लेकिन, फिर इस बात की चिंता नहीं रहती कि घर के बाहर एक गाडी खड़ी है, या ऑटो स्टैंड का ऑटो | कम से कम स्वयं की मृत्यु के भय से मुक्ति मिल जाती है | कम से कम परिवार बनाने का आंतरिक दबाव इस बात से नहीं होता कि वृद्धावस्था कैसे कटेगी |
शरीर वो कर पाता है, जो उसके लिए स्वास्थ्यवर्धक है | मन वो कर पाता है जो बीते कल की ग्लानि, या आने वाले कल की चिंता से ग्रस्त न हो | आपके चुनाव ही नहीं, आपके चुनावों के कारण, और उनके परिणाम भी बदल जाते हैं |
चाहे वो चुनाव विवाह का हो, आस्था का, यायावरी का, परिवार का, एकाकीपन का, या मुण्डन का | जब मन स्वतंत्र हो तो इंतज़ार नहीं करना पड़ता किसी की सार सँभार करने के लिए, उसके लिए साथ कुछ बुरा होने का | जब मन स्वतंत्र हो, तो शर्म नहीं होती बेवजह की, किसी को ये कहने में, कि "तुमसे आकर्षित हूँ, लेकिन औरों से भी हूँ" | जब मन स्वतंत्र हो तो आप समझ पाते हैं, कि आपका शरीर, आपका बुढ़ापा, आपका अकेलापन, आपका परिवार, आपका सामाजिक सामंजस्य आपकी अपनी ज़िम्मेदारी है | और ये भी समझ पाते हैं कि आपकी ज़िम्मेदारी सिर्फ अपनी स्वतंत्रता ही नहीं, दूसरों की स्वतंत्रता का संरक्षण भी है |
इस स्वतंत्रता के लिए जो करना पड़े, कर लो, ऐसा मुझे लगता है | फिर, जब दौड़ना हो तब डर नहीं लगता, जब अफेयर करना हो तब भी नहीं, जब ब्रेकअप करना हो तब भी नहीं | फिर डर नहीं लगता, जब चूड़ियाँ पहननी हों, जब सोच पहननी हो, जब लम्बी चोटी में वेणी गूँथ लेनी हो, या जब मुण्डन करवा के बैरागन का मन लिए संसार के बीच रहना हो तब भी नहीं |
सर पर हाथ फेरते-फेरते, विचारों का तारतम्य एकाएक
टूट गया जब मेरे
सहयात्रियों ने दरवाज़ा खटखटाया
और कहा, "चलो गंगा घाट
पर नाव में, समय
हो गया" | मणिकर्णिका घाट पर देह
की मुक्ति देखते हुए, इस बार
डर नहीं लगा | क्योंकि
जब मन स्वतंत्र हो
तो देह का बंधन
भी नहीं रह जाता
|
© Anupama Garg 2020