Friday, 20 May 2022

English and Me

मुझे इंग्लिश क्यों पढ़ानी है ?
मेरा स्वार्थ है।  मुझे उन लोगों के साथ बात करने में, ब्रेनस्टॉर्म करने में मज़ा आता है, जिनका एक्सपोज़र अच्छा हो। ये बात सच है कि इंग्लिश एक्सपोज़र का बेंचमार्क नहीं है।  लेकिन ये भी सच है, कि अच्छा लगे या नहीं, जितनी भाषाओँ से अनूदित साहित्य (कथा-साहित्य भी, और कथेतर साहित्य भी ) इंग्लिश में मिलता है उतना हिंदी में तो नहीं ही मिलता।  अनुवाद का स्तर भी बहुत अच्छा नहीं होता।  ऐसे में मेरे आस पास के इंटेलीजेंट शार्प लोग अगर अंग्रेजी सीखें तो मेरा अपना भी स्वार्थ है।  

तो फिर पैसे क्यों लेने हैं ?
क्योंकि भैया, भूखे भजन न होइ।  मैं किसी के गले पड़ के तो अंग्रेजी सिखाती नहीं।  अगर कोई सीख रहे हैं, तो कुछ तो उनकी ज़िन्दगी में भी बदल रहा होगा सीख के ? सोच के देखिये।  कितने लोग मिलते हैं शिकायत करते हुए कि काश हमें कोई अंग्रेजी सिखाता।  हमारी ज़िन्दगी में ये बदल जाता, वो हो जाता।  लड़की पट जाती या लड़का पट जाता, इंटरव्यू क्रैक हो जाता, एग्जाम क्लियर हो जाता, प्लेसमेंट हो जाता, और कुछ नहीं तो हम अच्छी पुस्तकें पढ़ लेते। इस सब के बाद भी अगर मैं फीस लिए बिना अंग्रेजी सिखाऊँ तो मेरे घर का राशन पानी, और संडे को कोक बिरयानी का इंतज़ाम आप कर दो यार !

इतने सब यूट्यूब चैनल और किताबें हैं तो, फिर आप से क्यों पढ़ें?
अगर यूट्यूब चैनल और किताब से सीखने वाले आप होते, तो ये सवाल ही न होता।  डिस्कशन, explanation, इंडस्ट्री में लिखने बोलने पढ़ने, अंग्रेजी से दाल रोटी कमा के खाने का लगभग 20 साल का अनुभव है।  मिल जाये यूट्यूब पे तो ज़रूर लीजिये।  मुझे आपके लिए ख़ुशी ही होगी।  

आप से सीखने के लिए क्या करना पड़ता है ?
हर बहाना 6  महीने के लिए बिलकुल छोड़ देना पड़ता है।  वीडियो को क्लास का substitute नहीं समझना होता। उसके बाद लगातार अभ्यास करना पड़ता है। भाषा को जीना पड़ता है।  बार बार बोल कर ज़ुबाँ पे अल्फ़ाज़ का स्वाद चखना पड़ता है।  किताबों से इश्क़ लड़ाना होता है।  फिर भी कभी कभी डाँट  पड़ती है।  

आप व्याकरण पर इतना ज़ोर क्यों देती हैं ?
क्योंकि व्याकरण के बाहर की खूबसूरती के पैमाने तब समझ आते हैं जब पहले व्याकरण की खूबसूरती समझ आये।  रूल समझेंगे तभी तो उसे सुंदरता से तोड़ेंगे।  जब कहीं अटकेंगे तो गूगल इस्तेमाल किये बिना अपनी गलती कैसे सुधारेंगे अगर ये नहीं जानेंगे कि व्याकरण में इस विषय को कहाँ ढूँढा जाये।  

आप कैसी टीचर हैं ?
मेलोडी खाओ, खुद जान जाओ :D


#English_With_Anupama

©Anupama Garg 2022

Wednesday, 4 May 2022

Gratitude Journal 2022 - 3 - Strength in the Face of Adversity

प्यार क्या है ? आपके घर के नीचे की किराने की दूकान वाली भाभी, जब अपने लड़के को कहतीं हैं, दीदी के घर में राशन नहीं है, 6 महीने बाद घर खुला है, पहले सामान पकड़ा के आ जाओ। आपके पापा मम्मी आपको दिन में 3 बार फ़ोन करना चाहते हैं, लेकिन एक ही बार करते हैं, कि आप काम कर रहे होंगे। आपके एक दोस्त की बेटी सुबह आपके गले लग के आपके घर से अपने घर जाती है। आपकी दूसरी दोस्त की मम्मी आपको गले लगा के आपका सर, आपका कन्धा चूम लेती हैं, वैसे ही जैसे वो अपनी बेटी का चूमती हैं।

आपका एक और दोस्त आपको कहता है, तुम जो कर रही हो, अच्छा कर रही हो, करती रहो । लोग जो आपसे पहले कभी नहीं मिले, आपको ऑफलाइन नहीं जानते, ऑस्ट्रेलिया में बैठ के, सोने के वक़्त, जाग कर आपकी क्लासेज अटेंड करते हैं। आप उन्हें डांटते हैं तो वे सम्मान से चुप चाप सुन लेते हैं। आप उन्हें प्यार से पढ़ाते हैं, तो मन भर के आपको प्यार देते हैं, यहाँ तक कि बैच में एक दूसरे को भी हद से बाहर जा कर हर संभव तरीके से सपोर्ट करते हैं।

और इस सब के बीच एक बेहूदा आदमी आपको किसी अनजान नंबर से फ़ोन करता है। इसे लगता है कि आपके टिंडर पर होने का मतलब उसे सेक्स मिलने की गारंटी है। इसे लगता है कि आपके सेक्स, polyamory , या BDSM बारे में बात करने का मतलब है कि आप उसकी भोग्या हैं. इसे लड़की की ना में हाँ सुनाई देती है। यह आपके कमिटमेंट को दिखाने वाली बातों को तोड़ मरोड़ कर आपको ही culprit बनाने की कोशिश करता है। ये आपको धमकी देता है, आपको डराने की कोशिश करता है। जब इसका बिलकुल बस नहीं चलता, जब इसकी कॉल रिकॉर्ड पर डाल दी जाती है, तो ये आपको रेप की धमकी देता है, आपसे पूछता है कि आप जैसी बदसूरत लड़की को कोई प्यार कर ही कैसे सकता है ?

और आप चूँकि क्लास में हैं, आपको नहीं पता ये कॉल किस नंबर से आयी है। आप ये नहीं जानते हैं कि ये आदमी वही लफंगा है, जो पिछले तीन साल से हर 6 - 8 - 10 महीनों में अपना नंबर बदल कर आपको harass करता आया है, और आप इसे ब्लॉक और इग्नोर करते आये हैं। और क्योंकि अभी आपको नहीं पता कि ये potential rapist है कौन, तो आप एकदम डिस्टर्ब हो जाते हैं। आप जैसे तैसे अपना दिमाग ठीक कर के क्लास करते हैं।

लेकिन आप एक पैनिक अपडेट डाल चुके हैं, जिसे अगले ही मिनट हटा लेते हैं, कि पैनिक में काम करना सामान्यतः आपकी आदत नहीं, specially आड़े तिरछे मामलों में। इतने में आपकी एक दोस्त आपकी ये फेसबुक अपडेट देख लेती है, जिसे आपने बमुश्किल एक ही मिनट में डिलीट कर दिया होता है, और अपना whatsapp नंबर मैसेज कर के कहती है, इमरजेंसी से अकेले डील करने की, घबराने की ज़रूरत नहीं है। इसने आपसे कभी बात नहीं की है, ये दुनिया के दुसरे छोर पर रहती है, ऑनलाइन friendships इसकी preference नहीं है, लेकिन ये आपको खाना, म्यूजिक, जोक्स,memes कुछ भी जो आपको रिलैक्स करे, भेजना भेजना चाहती है।

मुझे जो करना था,वो मैं कर चुकी हूँ। वकील की सलाह से बचा खुचा कल कर लिया जायेगा। इसलिए मुझे ये न बताएं कि मुझे सेक्सुअलिटी पर क्यों नहीं लिखना बोलना चाहिए। मुझे ये हरगिज़ न बताएं कि मुझे अपनी निजी ज़िन्दगी में कैसे रिश्ते बनाने चाहियें। लेकिन ये ज़रूर करें, कि आपके आस पास के दो कौड़ी के आदमी जिनके प्रोफेशनल credentials हैं, न कोई औकात, सिवाय बाप के खर्च पे फॉरेन पढ़ के आ जाने के; उन्हें कॉल आउट करें। बल्कि उन्हें ही क्यों, अपने आस पास के हर मर्द-औरत, हर पोटेंशियल एब्यूज़र को कॉल आउट करें।

प्यार सिर्फ वो नहीं है, जो मेरे आस पास के लोग मुझसे करते हैं। प्यार ये भी होगा कि हमारे आस पास के लोगों को हम वहशीपन करने से पहले ही ठोक पीट कर सीधा कर दें।

बाकी रहा मेरा, तो मुझे जानने की तुम्हारी औकात नहीं है बे चिरकुट (अगर तुम किसी फेक ID से ये पढ़ रहे हो), और मुझे तुम क्या आउट करोगे, मैंने जिस दिन पहली बार सोशल मीडिया पे अपना मुंह खोला था, उस दिन तुम्हारे जैसों को नाली में बहाना पहले सीख के आयी थी। बाकी तुम्हें सेक्स चाहिए हो या प्यार, लायक नहीं बनोगे तो मैं क्या, कोई लड़की कभी नहीं देगी। लायकात बनाओ, बकवास से कुछ नहीं मिलता इस दुनिया में।

और रहा मेरा, तो मैं उनमें से हूँ, जो इस एक्सपीरियंस से भी नयी लर्निंग ले के, solidarity, सपोर्ट, और ताकत ले के निकलूँगी। उस काबिलियत के लिए शुक्राना है,शुक्राना रहेगा <3 
 
#शुक्राने_की_डायरी_से -4©Anupama Garg 2022 

Monday, 2 May 2022

सहवास, समझदारी, और सहमति (Consent)

#sexuality_notes_by_anupama – 14

पहली बात, पोस्ट्स की पूरी सीरीज़ है, पढ़ेंगे तो कुछ सीखेंगे। दूसरी बात, भाषा का संयम रखें। यहाँ ट्रोलिंग, बदतमीज़ी, कुंठा, द्वेष, मर्यादा, संस्कारिता, शुचिता, ढ़ोंगीपन, आदि के लिए जीरो टॉलरेंस की नीति है।  तीसरी बात सवाल सिर्फ गूगल फॉर्म में।  और कहीं जवाब नहीं दिया जायेगा। 

दुःखद है कि सेक्स से obsessed  एक देश में जहाँ 130 करोड़ जनसँख्या है, कामसूत्र का क्लेम है, वहाँ या तो सेक्स और ऑर्गास्म के बारे में बात नहीं होती, या बात होती है तो धमकियों, द्वेष, हिंसा भरी। मैरिटल रेप यहाँ जायज़ समझा जाता है, सदियों से स्त्री का रोल महज पति की सेवदारनी का रहा है।  यहाँ होली है की आड़ में बेहूदे मर्द रिश्तेदारों के छिछोरेपन को बर्दाश्त करना संस्कृति है।  लेकिन ऑर्गास्म की बात करना लक्ज़री है? अगर औरत के ऑर्गास्म की बात करना खाये अघाये पेट का काम है, तो ऐसे ही 130 करोड़ हो गए?

खाये अघाये लोगों के मैसेज आये हैं मेरे पास।  पिछले कुछ महीनों में मेरे पास आये लगभग 100 प्रश्नों में से एक भी इस बारे में नहीं था, कि मैं अपनी पार्टनर को संतुष्ट कैसे करूँ।  मुझे बड़े बूब्स पसंद हैं, मुझे शीघ्रपतन है, क्या वो मुझे छोड़ देगी, मेरा साइज छोटा है, मुझे पोर्न की लत है, मुझे हस्तमैथुन की आदत है, सब सुना मैंने। लेकिन किसी को ये पूछते नहीं सुना, कि मैं अपनी पत्नी को खुश कैसे करूँ ? मैं ये कैसे जानूँ कि मेरी पत्नी को सुख मिला या नहीं ?

ऐसे में सहवास में सहमति के बारे में बात करना हर बात से अधिक ज़रूरी हो जाता है।  इसलिए आज की ये पोस्ट कंसेंट पर।

मुझसे बार-बार सवाल पूछा जाता है कि वास्तव में  सहमति है क्या ? किसकी सहमति मायने रखती है? क्या होता है जब सहमति के दायरों का उल्लंघन किया जाता है? किस परिस्थिति में कहेंगे कि सहमति की सीमाओं का उल्लंघन या अतिक्रमण हुआ? सहमति से जो दायरे तय किये गए, उनका अतिक्रमण न हो, इसके लिए क्या किया जा सकता है ? कैसे तय करें कि ये 'ना में हाँ' वाला मामला है, या 'ना का मतलब ना' वाला?

सहमति वास्तव में है क्या?

यहाँ एक बात तो ये है,  कि सहमति किसी काम को करने की व्यक्ति की इच्छा की स्पष्ट अभिव्यक्ति है।  यानि ये, कि यदि साफ साफ 'हाँ' न कहा गया हो तो उसे सहमति नहीं माना जाना चाहिए।  जब कोई कहता है कि 'मुझे नहीं पता' , या 'शायद' तो यह सहमति नहीं है। जब वे 'शायद' कहते हैं, तो यह चर्चा और अन्वेषण करने का निमंत्रण है, लेकिन यह सहमति नहीं है। सिर्फ इसलिए कि किसी ने मुस्कुरा कर, 'नहीं' बोला, इसलिए ये मान लिया जाये कि उनकी हाँ है, ये बेहूदी सिर्फ फिल्मों में ही अच्छी लगती है।  'ना में हाँ' टाइप की बकवास असली ज़िन्दगी में बहुत वाहियात है। 

दूसरा पक्ष सहमति का ये है, कि सहमति देने के लिए, दोनों, या सभी भागीदारों का वैधानिक रूप से वयस्क होना ज़रूरी है। वयस्कता की आयु 18 वर्ष है।  क्या ये आयु कम होनी चाहिए, ज़्यादा, या कुछ और, ये इस पोस्ट का विषय नहीं है। इसी तरह नशे के प्रभाव में दी गयी, या धमका कर ली गयी सहमति अमान्य है।  किसी को स्थायी रूप से नुकसान पहुंचाने की उसकी सहमति भी अमान्य है। किसी भी प्रकार की गैर कानूनी गतिविधि में हिस्सेदारी की कंसेंट, भी गैर कानूनी है। 

तीसरी बात, सहमति झूठ बोल कर, फुसला कर, बिना संभावित परिणामों के बताये या समझे, जब ली या दी जाये, तो वैधानिक रूप से भले ही वो मान्य हो, लेकिन, नैतिक रूप से देखा जाये तो वो अमान्य है।  वह सहमति नहीं कही जा सकती ऐसा ethics of sexuality के शोधकर्ताओं का मानना है। 

सहमति या कंसेंट के साथ एक बहुत ध्यान देने योग्य बात ये है कि किसी चीज़ के लिए एक बार कंसेंट देने का मतलब ये नहीं, कि हर बार कंसेंट है।  ऐसे ही किसी एक चीज़ के लिए कंसेंट देने का मतलब ये नहीं, कि उससे सम्बंधित सभी चीज़ों के लिए कंसेंट है।  इसे ऐसे समझें, कि यदि कोई व्यक्ति सेक्स करने के लिए एक बार राज़ी हो, तो इसका मतलब ये नहीं कि हर बार रज़ामंदी है।  इसी तरह सेक्स करने की रज़ामंदी का मतलब ये नहीं है, कि बिना condom के सेक्स करने की रज़ामंदी भी है।  हो सकता है किसी ने एक बार वाइब्रेटर के इस्तेमाल के लिए हाँ की हो, लेकिन उसी व्यक्ति को डिल्डो के इस्तेमाल से आपत्ति हो। 

सबसे ज़रूरी बात, अवधारणा के स्तर पर (conceptually)कंसेंट का व्यक्ति के लिंग से कोई लेना देना नहीं है।  ये सच है, कि पितृसत्तात्मक समाज में मैरिटल रेप, महिलाओं की गैर-रज़ामंदी की अवहेलना, बहुतायत में देखने को मिलती है, और कई बार कुछ वाहियात biased फैसले भी सुनने में आते हैं।  लेकिन वास्तव में, पुरुषों और महिलाओं की कंसेंट की एक जैसी वैधानिक और नैतिक अहमियत है। 

कई प्रकार की सेक्सुअल एक्टिविटीज़ में एक कॉन्सेप्ट है consensual  non - consent  का। इसे समझाना और समझना दोनों ही काफी मुश्किल है।  इसे प्रैक्टिस करने के लिए जिस तरह का भरोसा, जिस तरह  की सम्प्रेषण कला, जिस तरह की समझदारी की आवश्यकता है, वो आम तौर पर नहीं पायी जाती।  इसलिए हाथ जोड़ कर निवेदन है, कि यदि अपने पार्टनर पर अँधा भरोसा, और कुछ गलत हो जाने की अवस्था में बर्दाश्त का सब्र न हो, तो इस क्षेत्र को पूरी तरह निषिद्ध रखें। 

अब इस पोस्ट का सबसे ज़रूरी हिस्सा।  ये कैसे सुनिश्चित करें कि कंसेंट का सम्मान किया जायेगा, तथा उसकी अवहेलना, उसकी सीमाओं का अतिक्रमण नहीं होगा?

1.       सबसे पहले, संवाद करें; बहुत डिटेल में।  ये कहना कि इससे excitement ख़त्म हो जाता है, उत्तेजना ख़त्म हो जाती है, सिर्फ ज़िम्मेदारी से भागने के बहाने हैं। अपने साथी को, उनकी पसंद, नापसंद को पूछें, जानें, समझें, स्वीकार करें।  अपनी पसंद नापसंद उन्हें बताएं।  एक दूसरे पर थोपा-थापी न  करें, उससे कुछ नहीं मिलेगा। 

2.       दूसरी बात किसी भी नए व्यक्ति, या अजनबी के साथ पहले दिन इंटिमेसी या शारीरिक नज़दीकी बढ़ाने की जल्दबाज़ी में न रहें।  अगर अब तक सेक्स नहीं किया है, और अगर एक हफ्ता - 2 हफ्ते और नहीं करेंगे, तो जान नहीं निकल जाएगी।  सामने वाले को जान समझ लें, एक दूसरे की सेक्सुअल हिस्ट्री,सेक्सुअल पैटर्न्स, मेडिकल हिस्ट्री, STI  / STD रिपोर्ट्स शेयर कर लें। 

3.       सेफ वर्ड्स, सेफ कॉल्स के बारे में बात करें।  न कहने का एक प्रोटोकॉल तय करें। (इस बारे में जल्द ही विस्तार से बात करूंगी )।  Condoms के इस्तेमाल के बारे में, पिल्स के बारे में, यौन सुरक्षा के बारे में, यदि कोई गंभीर नहीं है, तो इस बात की क्या गारंटी है कि वो आपकी 'हाँ' या '' को गंभीरता से लेंगे?

4.       संदेह की स्थिति में सावधानी बरतें।  मान लिया कि सेक्स के बीच में रुकना निराशाजनक होता है, तकलीफदेह भी हो सकता है।  लेकिन अपने साथी को शारीरिक या मानसिक रूप से दर्द पहुँचाना (चाहे गलती से ही सही), कहीं अधिक निराशाजनक है ! असंतुष्ट होना, असंवेदनशील होने से कहीं बेहतर है !

5.       आज के लिए आखिरी बात।  इस दुनिया में कोई परफेक्ट नहीं है।  ये एक पोस्ट पढ़ के आप कंसेंट के चैंपियन हो जाएं ये उम्मीद नहीं है किसी को आपसे।  लेकिन इतनी उम्मीद ज़रूर है कि बात करना शुरू करें, और अगर गलती हो तो मान लें, बजाय ईगो ट्रिप पे जाने के। 

डिस्क्लेमर - मेरी वॉल पर सेक्स और सेक्सुअलिटी के सम्बन्ध में बात इसलिए की जाती है कि पूर्वाग्रहों, कुंठाओं से बाहर आ कर, इस विषय पर संवाद स्थापित किया जा सके, और एक स्वस्थ समाज का विकास किया जा सके | यहाँ किसी की भावनाएं भड़काने, किसी को चोट पहुँचाने, या किसी को क्या करना चाहिए ये बताने का प्रयास हरगिज़ नहीं किया जाता | ऐसे ही, कृपया ये प्रयास मेरे साथ न करें | प्रश्न पूछना चाहें, तो गूगल फॉर्म में पूछ सकते हैं | इन पोस्ट्स को इनबॉक्स में आने का न्योता न समझें | Google Form Link - https://forms.gle/9h6SKgQcuyzq1tQy6

©Anupama Garg 2022

 

 

Saturday, 30 April 2022

Gratitude Journal 2022 - 3 - Just Another Day

किसी किसी दिन कायनात एकदम गरीबनवाज़ मोड में चली जाती है 🙂 ❤


एक अदद जॉब ऑफर, एक अदद  छुट्टी, नए बैच का फॉर्मेशन, घर परिवार में सबके स्वास्थ्य  सबंधी शांति, सीखने को एक दोस्त से इतना कुछ मिलना, अकेलेपन का थोड़ा कम महसूस  होना, किसी दूसरी दोस्त के लिए स्पेस होल्ड कर पाना, किसी तीसरे दोस्त के लिए स्टैंड ले पाना, कुछ गा पाना, सब एक साथ हुआ।  


ख़ास बात - किसी बहुत ही पुरानी दोस्त का कुछ ऐसा कहना, कि आपको लगे कि आपको भी लोग समझते हैं। वे लोग जो आपके बचपन का हिस्सा हैं, जो आपके 'आप' बनने के सबसे लम्बे गवाहों में से हैं, उन्हें आप की बात समझ आती है।  ।  


मेरे सबसे करीबी लोग चाहते हैं, कि हम सब आने वाली पीढ़ी को वैचारिक और भावनात्मक ईमानदारी सिखा पाएँ । और क्या माँग लूँ एक ही दिन में?


शुक्राना ! दुआएँ ❤ 😘


#शुक्राने_की_डायरी_से - 3

 

©Anupama Garg 2022

Wednesday, 20 April 2022

Gratitude Journal 2022 - 2 Books

 किताबें जिन्होंने ज़िन्दगी बदल दी मेरी - 1

Gone with the wind  एक नाम था जो अटका था मेरे ज़ेहन में जब Titanic  बनी तब से।  काफी बात उठी थी तब उन फिल्मों की जिन्हें सबसे ज़्यादा अवार्ड्स या नॉमिनेशंस मिले थे।  मुझे यद् है मैंने मेरे English teacher  से पूछा कि इस नावेल के लेखक कौन हैं।  उन्होंने बताया, और मैं भूल गयी।  लेकिन एक अजीब सी कशिश थी इस नाम में।  कभी कभी यूँ ही बिना कुछ जाने समझे, मैं ये चार शब्द अपनी जुबां पे घुमा घुमा के उनका स्वाद चखती रहती।  

फिर जब 2006 में मैंने दिल्ली आयी, और मैंने एक कॉल सेंटर में नौकरी की, तो मैंने फिर से पढ़ना शुरू किया।  पढाई की किताबों के अलावा पिछले 6 साल में ज़्यादा कुछ नहीं पढ़ा था मैंने। इंग्लिश लिटरेचर बिलकुल भी नहीं पढ़ा था।  इसलिए सहकर्मियों से पूछा क्या पढ़ा जाये।  मुझे एक सहकर्मी ने ये किताब recommend की, और कई किताबों के साथ।  

मेरी ज़िन्दगी की धार बदल दी, project gutenberg की वेबसाइट, और इस महा लम्बे, शुरू के 100 पन्ने झेल, अमरीकी उपन्यास ने।  मैंने शुरू के 100 पन्ने सिर्फ ईगो और हेकड़ी के कारण झेले।  इस किताब ने मुझे पॉलिटिक्स, युद्ध, हिस्ट्री, अमरीका, सब चीज़ों के बारे में बहुत सिखाया, लेकिन मुझे याद सिर्फ एक बात रही, Scarlet और Rhett का प्रेम और उनका विछोह।  आज इस किताब को मैं दूसरी नज़र से देखती हूँ, लेकिन ये किताब उस वक़्त मेरे लिए वरदान साबित हुई।  उसके बाद जो पढ़ना शुरू हुआ फिर से, तो  चालू आहे :)

इसके बाद मेरे जीवन में आयी Johnathan  Livingston Seagull. किसी शार्ट टर्म ex ने मुझे गिफ्ट की थी।  लेकिन मुझे तब बिलकुल समझ नहीं आयी थी।  दस साल लगे मुझे वो किताब समझ आने से पहले।  लेकिन जब समझ आ गयी तब तक मैं जॉनाथन बन चुकी थी।  अगर आँखों में कोई सपना हो, तो भीड़ से अलग, भेड़ बने बिना, ज़िन्दगी बदलने के इस पुस्तक को पढ़ना कई लोगों के लिए वरदान साबित हो सकता है।  इस किताब के बाद मैंने Richard  Bach  की सभी किताबें पढ़ीं, मुझे उनकी One भी अच्छी लगी, लेकिन, इस किताब के लिए जो शुक्राना रहेगा, वो तो अलग है।  



The Witch of Portobello के बारे में तफसील से लिख चुकी हूँ पहले भी एक आध बार।  मुझसे 4 साल छोटी एक स्टूडेंट ने मुझे Paulo Coelho की एक किताब पढ़ने को दी, मैंने अगले ही दिन लौटा दी।  मैं 21 साल की थी।  मुझे, The Alchemist बिलकुल अच्छी नहीं लगी।  फिर जब मैं CAT की कोचिंग देने   इंस्टिट्यूट की लाइब्रेरी में मुझे Brida मिली।  और फिर मैं जा कर Paulo Coelho की जो भी किताबें उपलब्ध थीं, सब खरीद लायी।  


25 साल की उम्र में, इस किताब ने मुझे पहली बार NORMAL महसूस करवाया।  इस किताब ने मुझे सिखाया कि भीड़ से अलग होने के लिए, भीड़ से दूर जा कर खड़े होना भी ज़रूरी नहीं है। कि कभी कभी आपको कोई नहीं समझता, परिवार, दोस्त, माँ बाप, डॉक्टर, colleagues कोई नहीं।  लेकिन इस बात से कोई विशेष फ़र्क नहीं पड़ता।  लोग नहीं समझते इसलिए डरते हैं।  अगर उनके भीतर का डर निकाल दो, तो भीड़ में रह कर भीड़ से अलग होना साध सकते हो।  न भी साधना चाहो, और अंत में अगर अकेले होना चुनो, तो भी कोई बात नहीं।   Johnathan  Livingston Seagull का उस समय लॉजिकल सीक्वेंस निकली ये किताब मेरे लिए।  

किताबें बहुत पढ़ीं मैंने।  हिंदी में, अंग्रेजी में, अनूदित साहित्य भी। हर पुस्तक ने कुछ सिखाया।  हर किताब की एक कहानी है।  हर किताब का एक हक़ है मेरी ज़िन्दगी के शुक्राने पर। सभी कहानियाँ एक साथ नहीं कह पाती, आँखें और गला दोनों ही भर-भर आते हैं।  

लेकिन, ये कहानियाँ भस्म न हो जाएं एक दिन देह के साथ, इसलिए इन्हें कह देना ज़रूरी है।  अगर किसी दिन मुझे Alzheimer's हो जाये, तो ये मेरी याददाश्त फिर ज़िंदा करने की कोशिश में काम आ जाएं।  अगर कहीं कोई हो, इस देस में, इस दुनिया में, जिसे इन कहानियों की ज़रा भी ज़रूरत हो, तो ये उस तक पहुँच जाएँ।  इन कहानियों ने मेरा जीने में, ज़िंदा रहने में, ज़िंदादिल रहने में बहुत साथ दिया है।  इन किताबों ने मुझे बहुत संभाला है।  इन के लिए शुक्राना <3

#शुक्राने_की_डायरी_से - 2

©Anupama Garg 2022

Gratitude Journal 1

कई बार आप इर्द गिर्द देखते हैं, और आपको सिवाय निराशा और हताशा के कुछ नजर नहीं आता। आपको उदास होने के 100 कारण दिखते हैं, मां पिता की उम्र, घर वालों का स्वास्थ्य, खुद के स्वास्थ्य में आने वाले परिवर्तन, अपना करियर, अपने दोस्तों की बीमारी, देस दुनिया में हर तरफ लगी आग, भूखे मरते दुखी लोग, कभी खत्म न होने वाली लगती अपनी ज़िम्मेदारियों का बोझ, और न जाने क्या क्या । 
 
ऐसे में डिप्रेशन होना, थक जाना, उदासी स्वाभाविक है। खास तौर पर अगर पहले कभी भी mental health crisis झेला है तो और भी ज़्यादा। इससे कोप करने का सबका अपना अपना तरीका है। उन तरीकों में सही क्या, गलत क्या? लेकिन उन तरीकों में हानिकारक चीज़ें शामिल न हों तो बेहतर। 
 
जैसे मैं ये अनुभव से जानती हूं कि मेरे लिए व्यक्तिगत तौर पर शराब में गम गलत करने से बेहतर, काम में डूब लेना है। जैसे मेरे लिए किसी वक्त खाना एक बहुत आसान तरीका था इमोशंस से कोप करने का। लेकिन diabetes पता चलने के बाद अपने आप ही ये coping mechanisms बदलने लगे धीरे धीरे।
मेरे लिए बहुत से एक्सपेरिमेंट्स में से एक चीज जो पिछले कुछ सालों से काम करती है, वो है gratitude जर्नलिंग । हर साल मैं 7/15/21 दिन टाइप का कुछ लिखती हूं, इस बार लेकिन मैं पूरे 51 पोस्ट्स करना चाहती हूं। कर पाऊंगी या नहीं, ये नहीं जानती, लेकिन ये जानती हूं, कि मैं ये कर के देखना चाहती हूं।
 
मगर, 2 disclaimers के साथ - 1. सिर्फ इसलिए कि मैं कर पाऊंगी या करूंगी, इसका मतलब ये नहीं है, कि ये सबको करना चाहिए, या कि सबको ये अच्छा लगे। इसलिए अगर आपको मेरी पोस्ट्स से थोड़ी झल्लाहट हो, तो कुछ दिन के लिए उन्हें न देखें।
2. मैं खुद के लिए ये ध्यान रखना चाहती हूं, कि ये पोस्ट्स न तो मेरे अपने काम को कमतर आंकें, न ही मुझे टॉक्सिक पॉजिटिविटी का शिकार बना दें। किसी बात के लिए शुक्रगुज़ार होने का मतलब ये नहीं, कि मैं उसके लिए मेहनत नहीं करती। न ही ये कि मैं जीवन में आज की समस्याओं से मुंह मोड़ लूं, या उन्हें नकार दूं। 
 
इसलिए जब मुझे ऐसा लगेगा कि इन दोनों डिस्क्लेमर्स में से कोई भी समस्या सताने लगी है, तो रोक दूंगी ये journaling । हालांकि ऐसा होने का अंदेशा कम है, लेकिन अगर हुआ, तो कुछ और ट्राई किया जायेगा । तब तक के लिए journey चालू आहे 💕💟

Sunday, 10 April 2022

Cobalt Blue - A movie Review

 


एक ठहरा हुआ छोटा सा तालाब है, एक ठहरी हुई फिल्म है, कुछ ठहरे हुए फ्रेम्स हैं। एक कछुआ है, जिसका नाम Pablo Neruda रखने वाला नायक एक दिन पंख लगा के उड़ जाना चाहता है। मुझे PMT के लिए drop करके prepare करने वाला हर वो student याद आ गया जो अपने नाम के आगे Dr. लगा लेता था, छुपा के। तब manifestation, affirmation जैसे डेली 5 minutes guided meditation नहीं होते थे न । यही सपने होते थे, तालाब के कछुए से पृथ्वी का भार धोने वाला कच्छप अवतार बनने के सपने।

तनय नहीं बनी मैं फिल्म में बहुत ज़्यादा । कोई तो कारण है, इस बात के अलावा कि तनय gay है, कि मैं तनय के साथ ठगा हुआ महसूस नहीं कर पाई खुद को। मुझे याद नहीं कभी कि मैंने अपनी सेक्सुअलिटी को देह के आवेग में इतने ज़बरदस्त तरीके से महसूस किया हो।  लोग थे जिनके साथ मुझे अनुजा जैसा महसूस हुआ, लोग जिन्होंने जज नहीं किया, लोग जिन्होंने मुझे खाँचों में ठूँसने की कोशिश नहीं की; जिन्होंने मेरी देह से मेरा परिचय करवाया; क्योंकि उनका कोई कमिटमेंट नहीं था मेरे लिए। 

लेकिन पूरी तरह से अनुजा को भी नहीं महसूस कर पायी मैं, सिवाय एक एम्पथेटिक महसूसियत के, कि वो एक लड़की है जो ठगी गयी।  ये बात अलग है कि मैंने कभी जीवन में ठगा बहुत महसूस किया ही नहीं, न ही मुझ पर परिवार के 'उतने' दबाव रहे, मोल्ड में फिट होने के लिए।  मेरी सहेलियां भी नहीं रहीं, जो कभी मेरे लिए स्टैंड लेतीं, हालाँकि, एक ने कभी मुझे अपने लिए स्टैंड लेने को ज़रूर कहा, जो मैंने नहीं लिया। बस उसके काम में लंगी नहीं मारी इतना ही।   

मैंने जीवन के शुरुआती 22 - 25 सालों में खूब प्राइवेसी तलाशी।  एक कमरे में हम 5 जन और मेरी डायरी छुपाने की नीड हालाँकि मुझे मालूम था घर वाले नहीं पढ़ेंगे।  मेरी सेनेटरी नैपकिन छुपा कर रखने की नीड, क्योंकि घर में एक पिता और दो भाई हैं, जो उसी कमरे में रहते हैं।  जल्दी जल्दी मोहल्ले के shared latrine  में फ़ारिग होने की नीड कि सुबह लाइन लगी होती है।  फिर एक वक़्त आया, मैं दिल्ली गयी, होस्टल्स में नहीं रह पायी, और जब rented room  लिया उस पेइंग गेस्ट की तरह, तो प्राइवेसी की अफ़रात हो गयी।  बस लोगों को भावनात्मक रूप से ठगना नहीं आया।

उस फिल्म को जो कुछ ब्लू बनाता है, क्या वो वाकई उसे ब्लू बना रहा है, या पाब्लो नेरुदा को गाँव के तालाब की सीमा, और आसमान का अंतहीन नीला दिखा रहा है? सिवाय उसकी unethical polyamory के, मुझे कुछ भी नहीं खटका उसका।  उसका ये कहना कि क्या आज मैं अकेला सो जाऊँ; उसका bisexual होना, उसका बॉयफ्रेंड (अगर तनय उसका बॉयफ्रेंड था तो) की बहन के साथ भाग जाना, उसका लौट कर न आना, मुझे कुछ अजीब नहीं लगा।  शायद इसलिए कि जब आप अपनी जड़ें किसी शहर से उखाड़ लेते हैं एक बार, तो घर न होने का भाव आपके जीवन का स्थायी भाव बन सकता है।  ये इस पर निर्भर करता है, कि आप ऐसा कितनी बार करते हैं।  मेरे सभी विदेशी यायावर दोस्त याद आ गए मुझे उन कुछ फ्रेम्स में।  कहा न, बस एक ही चीज़ अखरी - उसकी unethical polyamory .

एक phase  था ज़िन्दगी में, जब queer  न होते हुए भी, मैंने लिटरेचर टीचर वाले loneliness , उस डेस्परेशन को भोगा है।  मैंने भले ही शॉक न लिए हों, न गे होने का 'ट्रीटमेंट' , लेकिन सेक्सुअलिटी की किसी भी fringe  पे खड़े होने का मेन्टल हेल्थ पर क्या असर पड़ सकता है, ये जानती हूँ।  3 किताबें छद्म नाम से क्यों लिखीं का कारण बहुत हद तक वही है, जो literature के प्रोफेसर की दयनीयता का है।  लेकिन उतना डेस्परेशन कितना दयनीय बनाता है आपको, खुद के लिए तक कितना undesirable, और उस desperation से बहार आने के लिए आपको एक मोमेंट ऑफ़ ट्रुथ चाहिए होता है; ये इस फिल्म ने शानदार तरीके से दिखाया। 

ये फिल्म बार बार जब देखूँगी मैं, तो सिर्फ उस प्रोफेसर के लिए, और उस nun के लिए जो अपना मोमेंट ऑफ़ ट्रुथ पहचान कर किसी तालाब के पाब्लो नेरुदा को पंख दे कर आसमान में उड़न भरने के लिए आज़ाद कर देते हैं। इस फिल्म के वो चंद scene जिसमें वो प्रोफेसर लेटरहेड पर sign करता है, और तनय से कपडे पहनने के लिए कहता है, और जिसमें Mary तनुजा को पैसे दे कर, सिफारिश लगा कर, नौकरी दिलवा कर भागने में मदद करती है; वो मुझे हमेशा याद दिलाएँगे की मैंने मेरे जीवन की पहली तीन किताबें क्यों, और कैसे लिखीं थीं। अपने मोमेंट ऑफ़ ट्रुथ को दोबारा एक फ्रेम में जीने के लिए। 

अच्छी फिल्म है, ठहराव लिए, कहीं कहीं सॉफ्ट पोर्न जैसी, कहीं कहीं कविता जैसी। प्रिविलेज वाली दुनिया तो है ही जिसमें 90 के दशक में लड़का लिटरेचर पढ़ रहा है, और लड़की हॉकी खेल रही है, लेकिन Kerala के बैकड्रॉप में स्वीकार पाना मुश्किल नहीं है एक संवेदनशील भाई और एक फेमिनिस्ट बहन को एक ही लड़के से प्यार हो जाना।शायद ये Kerala के प्रति मेरा बायस हो, या शायद लिबरल environments के प्रति, लेकिन उससे फिल्म के कथ्य पर कोई खास फर्क नहीं पड़ता।  बस ये ध्यान रहे कि कोई भी फिल्म, मुद्दे के हर पहलू को सिरे से सिरे तक संभाल पाए ऐसा कम ही होता है।  फिल्म को फ्रेम्स के लिए देखिये, एम्पथी और सेल्फ एक्सेप्टेन्स की जर्नी के लिए देखिये, विमर्श इन्सिडेंटल है। 

 

 

 ©Anupama Garg 2022