Friday, 13 September 2019

असुविधाजनक बातें - भाग 1

सवाल ये नहीं है कि मुद्दा क्या है? सवाल ये है कि विमर्श कैसा हो? संवाद कैसा हो?

मुझे नहीं मालूम कि हम में से कितने लोग वास्तव में रेप की बात करना चाहते हैं, और कितने लोगों को रेप के बारे में बात करना सिर्फ कूल लगता है | मुझे यह भी नहीं मालूम कि कितने लोगों को रेप के बारे में सिर्फ इसलिए बात करनी होती है क्योंकि बलात्कार के बारे में बात करना जरूरी है, या इसलिये क्योंकि उनके आसपास हर कोई बलात्कार के बारे में बात करता है और क्योंकि उन्हें एक सोशल स्ट्रक्चर में फिट होना है | 

लेकिन मुझे यह जरूर मालूम है कि बलात्कार जैसे मुद्दों के बारे में जितना कैजुअली हम लोग बात करते हैं उतने कैज़ुअल ये मुद्दे है नहीं | इन मुद्दों की गंभीरता को सिर्फ सजा देने भर से एड्रेस नहीं किया जा सकता | इन मुद्दों को एड्रेस करने के लिए यह जरूरी है कि इनके बारे में गंभीरता से विमर्श हो | इस विमर्श में ये ढूंढने की कोशिश की जाए कि आखिर बलात्कारी मानसिकता कैसी है ? वह क्या है जो किसी पुरुष, या किसी स्त्री को अपनी इच्छा दूसरे पर थोपने के लिए मजबूर कर देता है?

कहीं ऐसा तो नहीं कि हम यह भूल जा रहे हैं कि बलात्कार पुरुष का भी हो सकता है ? कहीं ऐसा तो नहीं कि हम बलात्कार जैसे मुद्दों की आड़ में कुछ दूसरे सवाल नजरअंदाज कर रहे हों ? कुछ ऐसे मुद्दे जिन्हें समझाने का कोई तरीका हमें नहीं आता, संवाद से जुड़े मुद्दे, जिनमें बात करनी पड़े ऐसे मुद्दे, जिनमें अपना आडम्बर छोड़ कर, अपना झूठ छोड़ कर, अपनी ज़िम्मेदारी उठानी पड़े, जिनमें सामने वाले को समझना पड़े - कहीं ऐसे मुद्दों को न एड्रेस कर पाने का नतीजा तो नहीं, कि कोई भी मुद्दा हो, हम विमर्श कर ही नहीं पाते ? कहीं ऐसा तो नहीं कि 'बलात्कार' 'बलात्कार' चिल्लाने से, नारे लगाने से, हमें जो ऊपरी संतुष्टि मिलती है, उसी संतुष्टि तक हमारी सोच सीमित है?

सवाल ये नहीं है कि मुद्दा क्या है? सवाल ये है कि विमर्श कैसा हो? संवाद कैसा हो?

© Anupama Garg 

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