Monday, 16 September 2019

असुविधाजनक बातें - भाग 3

ऐसा क्या है सेक्स के बारे में जो हम उस बारे में बात नहीं करना चाहते ? कहीं ऐसा तो नहीं कि शुरुआत में कपड़े पहनने की जो आदत इंसान ने अपने शरीर को सुरक्षित रखने के लिए डाली थी, कहीं वही हमारे बीच की दीवारें बन गई है ? कहीं ऐसा तो नहीं कि सुरक्षा से शर्म, और शर्म से चुप्पी की ओर चलते हुए हमने निजीपन या प्राइवेसी को एक अंधेरे कोने में बदल दिया है, जहाँ हम खुद भी नहीं झांक पाते | मुझे इस बात में शुबहा नहीं कि आपकी व्यक्तिगत जिंदगी आपकी अपनी है, मगर मुझे इस बात का अफसोस है कि इस निजता की आड़ लेकर लोग कैसे रिश्तों में दोगलापन बरत पाने की छूट ले लेते हैं |

आप अपने पति या पत्नी के साथ सेक्स की बात भी नहीं करेंगे, आप किसी काउंसलर के पास जाने के बारे में सोचेंगे नहीं, मगर आपकी ही जितनी सीमित सोच वाले किसी दोस्त की ये सलाह कि मल्टी रॉड लगवाने से महिलाएं मोटी हो जाती हैं, मान लेंगे? आप अपने जीवन साथी/यों से बात करने से जी चुरायेंगे, मगर आपको ये उम्मीद है, कि आपके एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर में आप खुश रह पाएंगे | ज़ाहिर सी बात है एथिकल पॉलीएमोरी या नीतिपरक बहुप्रेमी प्रथा के बारे में न तो आपने पढ़ा है, न पढ़ने की ज़ेहमत ही उठाना चाहते हैं | कई जिन्होंने कुछ अधकचरा पढ़ लिया होता है, उन्हें ऐसी बातों की आड़ ले कर सिर्फ सेक्स करना होता है, वो सेक्स जिसके बारे में भी कुछ ख़ास समझते नहीं हैं वे |

अक्सर हम जब पकड़े जाते हैं तो जस्टिफाई भी करते हैं | मगर इतनी हिम्मत नहीं होती कि ये कह सकें, कि एक से ज़्यादा लोगों से प्यार करना है | और उसकी जड़ इस बात में छुपी है, कि आपको सम्बन्ध, सम्भोग और स्नेह में फ़र्क़ करना आता भी नहीं और आप ये फ़र्क़ सीखना चाहते भी नहीं | और अगर कोई और इन मुद्दों पर खुल कर बोले या अपना सच स्वीकार करने की कोशिश करे, तो या तो आप उसे डरा देते हैं, और या उसे शर्मिंदा करने की कोशिश करते हैं | आप हाथों हाथ उसे बेशर्म, गैर जिम्मेदार, इम्मोरल,अनैतिक, धोखेबाज़ और ऐसे ही अनेक शब्दों के तमगे पहना देते हैं |

सच ये है कि संबंधों का कोई जायज या नाजायज होने का तरीका नहीं होता, मगर ऐसा जरूर है कि कुछ लोगों ने किसी वक्त में अपनी सहूलियत के हिसाब से कुछ नियम बनाए थे | सवाल यह है कि क्या वही नियम पीढ़ी दर पीढ़ी हमें ढोते जाने चाहिए ? जिस वक्त दुनिया की आबादी कुछ चंद करोड़ लोग थी, उस वक़्त जो नियम लागू होते हैं क्या आज साढ़े सातअरब की जनसंख्या पर आप वही नियम लागू कर सकते हैं ? क्या यह संभव है कि जो नियम जमीन और जायदाद के चलते बनाए गए थे, और जिनके द्वारा परिवार, विवाह, और एकपत्नी या एक पति रखने की प्रथा चालू की गयी थी, आज भी वही प्रथा चलाकर आप सबको खेती की ज़मीन दे पाएंगे? सबका पेट भर पाएंगे ?

क्या यह संभव है कि मानव अब वह मानव नहीं रहा, और मानव का यह बदलाव अच्छा या बुरा नहीं, मात्र एक तथ्य है? यह तथ्य स्वीकारने में समय और प्रयास दोनों ही लगेंगे, कि समाज के ढांचे , और संबंधों के आमूलचूल स्ट्रक्चर में कुछ परिवर्तन तो आया ही है, कुछ जारी है और कुछ आता रहेगा | इसलिए संवाद करना और भी जरूरी है |

ना तो मैं यह कह रही हूं कि आप हवा के बहाव में बह जाएं और ना ही यह क्या बरगद के पेड़ की तरह बंद कर पुरानी लीक पकड़े रहें | मैं सिर्फ यह कह रही हूं कि यदि इन मुद्दों के बारे में हम खुला संवाद कर पाएंगे तो बदलती मानवीय सभ्यता की बदलती जरूरतों को भी आराम से एड्रेस कर पाएंगे | इसका नतीजा यह होगा कि बेवजह के टकराव, बेवजह के झूठ, लाचारी, और बेईमानी में निश्चित ही कमी आएगी और ईमानदारी से बने ऐसे रिश्ते आने वाली पीढ़ी की भावनाओं, विचारों और मानसिकता को बेहतर तो जरूर बनाएंगे |

लेकिन यह हो सिर्फ तभी पाएगा जब हम अपने पहले से जमे हुए विचारों को, खुद के लिए बदलने में दिलचस्पी लेंगे | यह तब हो पाएगा जब हम परिवार के ढांचे, समाज की संरचना और नैतिकता की मिसालों को बदलने के लिए तैयार होंगे | ज़ाहिर सी बात है यह काम आसान नहीं होगा | यह काम कुछ 2, 5, 10 लोगों के करने का भी नहीं है | यह काम समूची मानवता को सामूहिक तौर पर करना होगा | अब सवाल यह है यह करने के लिए पहला कदम क्या होगा? मेरी नज़र में, संवाद और विमर्श, इस बदलाव की ओर पहला सुदृढ़ कदम होगा |

"सवाल यह नहीं कि मुद्दा क्या है | सवाल यह है कि संवाद कैसा हो ? विमर्श कैसा हो?

©Anupama Garg 2019

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