Friday, 2 October 2020

मुझे नींद नहीं आती

मुझे नींद नहीं आती
शुक्राना है, कि मैं माँ नहीं, मैं पिता नहीं
शुक्राना कि Margaret Atwood के Handmaid's tale में
शायद मैं unwoman होती |
नहीं चाहिए मुझे वो बच्चियाँ जो सामान भर हैं,
सदियों से, दान के लिए, भोग के लिए, अत्याचार के लिए भी |

मुझे नींद नहीं आती
कि नहीं चाहिए मुझे भगोड़ापन,
शुतुरमुर्ग की तरह जो रेत में सर घुसा कर
बलात्कार पर तटस्थ रहता है |
जो कहता है, "हमारे यहाँ नहीं होता'
जो कहता है, 'ये दु:खद तो है, लेकिन ज़िम्मेदारी मेरी व्यक्तिगत नहीं |"

मुझे नींद नहीं आती
क्योंकि आज कोई 72 साल का बूढा आदमी आज सड़क पर नहीं निकलता |
जवान औरतें कैद हैं,
सोनचिरैया सी, या जंगली बटेर सी,
अपने अपने पिजड़ों में |
और जवान मर्दों को या धर्म की अफ़ीम चटा दी गयी है
या रोटी कपडा मकान में उलझा दिया है,
शक्ति या है नहीं
या उसका दुरुपयोग हो रहा है |

मुझे नींद नहीं आती
कि सारा देश गांधारी है,
कि सारा देश धृतराष्ट्र है |
क्या फायदा कृष्ण का देश होने का,
जब बनना हम सबको कौरव है?

मुझे नींद नहीं आती
डॉक्टर कहता है अवसाद है,
मुझे लगता है
ये मेरे द्रौपदी के देश में औरत बन कर पैदा होने का प्रतिसाद है |

"खलक खुदा का, मुलुक बाश्शा का
हुकुम शहर कोतवाल का.
हर खासो-आम को आगह किया जाता है
कि खबरदार रहें
और अपने-अपने किवाड़ों को अन्दर से
कुंडी चढाकर बन्द कर लें
गिरा लें खिड़कियों के परदे
और बच्चों को बाहर सड़क पर न भेजें
क्योंकि
एक बहत्तर बरस का बूढ़ा आदमी अपनी काँपती कमजोर आवाज में
सड़कों पर सच बोलता हुआ निकल पड़ा है !"


लेकिन नहीं, अब नहीं,
चलो हम सब बैठें घर में
नकार दें सत्य जातिगत हिंसा का,
स्त्री-द्वेष का
सड़क पर निकल कर क्या करेंगे?
Covid -19 से बचना ज़्यादा ज़रूरी है,
संप्रदाय विशेष, जाति विशेष, लिंग विशेष, यौनिकता विशेष, वर्ग विशेष को मरने दो |
नींद की गोली खाओ
सो जाओ |


मुझसे मत पूछो कि मुझे नींद क्यों नहीं आती,
कि मैं अभिशप्त हूँ
बैताल को कंधे पर ढ़ोते रहने को |
मुझे नींद नहीं आती,
मेरे भीतर का बैताल मुझे सोने नहीं देगा,
कि जब तक न्याय नहीं होगा |

 © Anupama Garg 2020

* An excerpt from a poem by Dharmvir Bharti has been used.





No comments:

Post a comment

Share your thoughts