Friday, 23 January 2015

Ek kaur Khichdi - खिचड़ी का एक कौर

कुछ दाल,
थोड़ा चावल ।
कुछ मुस्कराहट,
बहुत बरसते बादल ॥

मुट्ठी भर खिचड़ी,
तबीयत नासाज़,
कुछ बिगड़ी ।

नीचे ठण्ड में खड़े ना रहना पड़े ज़्यादा तुम्हे
इसलिए दौड़ आना तीन मंज़िल;
और चुपचाप मेरा पालतू बिल्ली सा
तुम्हारे पीछे पीछे
फिर सीढ़ी चढ़ जाना ।


मैंने भगवान को भोग
कम ही लगाया है,
पर जब तक हो सके
खाना किसी के साथ ही खाया है ।


जूठा खिलाने में मगर,
हमेशा शर्म आती है;
और वो भी खिचड़ी ??


तुम्हारा मुझसे थाली माँगना
सकुचा गया मुझे,
उसी में से एक कौर खा लेना
भिगा गया मुझे ।
और फिर एक कौर मुझे अपने हाथ से खिलाना
मेरी मुर्दनी से जिला गया मुझे ॥
उसी एक कौर खिचड़ी के भरोसे


पिछले पूरे हफ्ते,
मैं ज़िन्दगी का ज़हर
उफ़ किये बिना पी गयी ।
उसी एक कौर खिचड़ी के भरोसे
मैं फिर एक बार जी गयी । ।




©Anupama Garg 2015 January

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